विज्ञान

सामान्य

कलियुग को कलयुग है इसने बनाया, पुरे धरा पर बन बादल ये छाया |

आसान हुआ अब हरेक काम अपना, वह विज्ञान है जिसने सबकुछ रचाया |

 

मानव के मस्तिष्क की है यह उपज, छोड़ पैदल हमे उड़ना है सिखाया |

दबाव बटन काम हो जाये पूरा, वह विज्ञान है जिसने समय बचाया |

 

विद्युत् बनाकर किया स्वप्न पूरा, निशा को भी इसने दिवा है बनाया |

विकसित किये कई उद्योग धंधे, वह विज्ञान है जिसने पोषण कराया |

 

देवों की हस्ती कहाँ खो गयी अब? दुनिया में छाई अब इसकी ही माया |

धरती के भीतर छिपे भेद लाखों, वह विज्ञान है जिसने हल कर दिखाया |

 

संग फूलों के जैसे होते हैं कांटें, वैसे ही इसने विध्वंस भी कराया |

एटम बम जैसे कई शस्त्र रचकर, वह विज्ञान है जिसने संकट बढाया |

 

मशीनीकरण हुआ हर जगह अब, चल था जो कल, उसे निष्चल बनाया |

जीवन अनिश्चित हुआ संकटों से, वह विज्ञान है जिसमे अंत भी समाया |

 

यह विज्ञान क्या है ? एक तलवार है, जिसने दोनों तरफ एक-सा धार पाया |

रक्षा करो अपनी या खुद को काटो, यह उपयोग पर इसके निर्भर हो आया |

वह विज्ञान है जिसमे सबकुछ समाया |

 

( यह कविता भी मैंने स्कूल के समय ही लिखी थी )

 

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