याद में उसके

सामान्य

याद में उसके जीवन मरण बन गया,

गम का चादर मेरा कफ़न बन गया;

जलती रही सांसे, सुलगते रहे अरमान,

दूर रहकर जीना अब तड़पन बन गया।

 

कम हुई आस जब पाने की उसको,

नस-नस का खून जैसे अगन बन गया;

गम इस काले संसार में देखो,

ठंडा हवा का झोंका गर्म पवन बन गया।

 

याद कर उसको छलकती हैं आँखें,

आन्हें भरते जीना अब चलन बन गया;

नाम लेकर उसका जख्मों को सीना,

अश्कों को पीना ही लगन बन गया।

 

यादों की दुनीया गम से भरी पड़ी,

अंत नहीं जीसका वो गगन बन गया;

एक ही तस्वीर अपने मन में लीये,

यादों में उसके मैं मगन बन गया।

 

पलकों पर लीये अश्कों का भार,

हर लम्हा अन्तीम चरण बन गया;

गम के आग में कुछ ऐसा तप,

तन मेरा प्राण रहीत बदन बन गया।

 

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