कॉलेज के वो चार दिन

सामान्य

आज कभी जब तन्हाई में आँखें बंद मैं करता हूँ;

याद तो बरबस आ जाते हैं कॉलेज के वो चार दिन|

 

आधी बनी सी वो बिल्डिंग,ठक-ठक करती वो आवाजें;

नये-नवेले वो अगणित चेहरे,बनती बिगड़ती जज्बाते|

 

पूरा सेमेस्टर मस्ती करना,लास्ट मोमेंट की रतजग्गी;

रिजल्ट के दिन वो छटपटाना,दिल में उठती अगलग्गी|

 

कॉलेज जाके बंकिग करना,केंटिन में वो गपबाजी;

ईंट्रो देना ईंट्रो लेना,कभी-कभी वो रँगबाजी|

 

ग्रुप बना के घुमना फिरना,ग्रुप में जाना परवाना;

आँख में आँसू ला देते हैं,कॉलेज के वो चार दिन|

 

कभी-कभी वो नारेबाजी,बात-बात पे वो हड़ताल;

कभी-कभी वो सिर फुटोव्वल,पुलिस वालों की वो पड़ताल|

 

कमरे में वो रात का जगना,ताश के पत्तों का बिखराव;

कम्प्यूटर के वो गेम का लत,एक दूजे का रख-रखाव|

 

फोन पे घन्टों बातें करना,सबकी करना टाँग खिंचाई;

हरपल को महका जातें हैं,कॉलेज के वो चार दिन|

 

ऑफ केम्पस के हसीन से सफर,फंक्शन का वो डाँस कराना;

चाय दुकान पे हो-हल्ला और रेस्त्राँ में बर्थ डे मनाना|

 

आज कहाँ अब किसको फुरसत और कहाँ अब अपनी किस्मत;

कॉलेज के वो लम्हें तो बस यादों में ही सिमटे हैं|

 

याद कर उनको आँख छलकती,दिल भी तो भर जाता है;

जेहन में हरवक्त जियेंगे,कॉलेज के वो चार दिन|

 

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